
खत्म हो जाती है
उम्र युंही
मौत तो एक
बहाना है
कितना जिए
किसके लिए
क्यां आजमाये
क्यां नही
एहसान कितने
कितनी पहचान
लमहे आखिरी
कौन है साथ
ये साथ भी शायद
नही जरूरी
अहमीयत उसकी
लगती नही
उम्र सारी
बीत गयी
धुंध आखिरी
सामने
क्या रूतबा
क्या शौहरत
सफर है आगे
गुमनामी का
बेइंतिखाब अब
खो जाना है
वक्त के बंजर
अंधेरो मे
©️ShashikantDudhgaonkar
