छत, दीवारें और रिश्तें





छत, दीवारें और रिश्ते | हिंदी कविता | Shashikant Dudhgaonkar




छत, दीवारें और रिश्ते

कौन इस घर की देखभाल करे
रोज एक चीज टूट जाती है
चालाक है सभी साकिन यहां
फिर भी क्यों टूट जाती है
जोड़कर हर एक कोना
चार दीवारें जो बनाईं हैं
खामी रह गयी शायद छत में
जो चीजें टूट जाती हैं
अपनी अपनी जगह पर यहां
महफूज हर चीज है
थरथराहट है हाथों में शायद
जो चीजें टूट जाती हैं
जोड़ देना उठाकर टुकड़े
कोशिश मेरी जारी है
गलती शायद गोंद की है जो
चीजें टूट जाती हैं
टुकड़ों से फर्श भरी पड़ी है
दरारें चौड़ी दीवारों में
रिश्तों में कोई खोट है शायद
जो चीजें टूट जाती हैं


2 thoughts on “छत, दीवारें और रिश्तें”

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